राजस्व ग्राम का मामला गरमाया – सड़क से संसद तक गूंजी राजस्व ग्राम की मांग, हजारों परिवारों का भविष्य अधर में -कागजों में अटकी पहचान, जमीनी हकीकत से बेखबर सिस्टम
वन भूमि सर्वे को लेकर लंबे समय से विवादों में रहे ऋषिकेश के बापूग्राम और मीरा नगर एक बार फिर सियासी और सामाजिक बहस के केंद्र में आ गए हैं। इन इलाकों को राजस्व ग्राम घोषित करने की मांग अब स्थानीय आंदोलन से निकलकर संसद के सदन तक पहुंच गई है। उत्तराखंड से राज्यसभा सांसद महेंद्र भट्ट ने बुधवार को राज्यसभा के शून्यकाल में यह मुद्दा उठाते हुए केंद्र सरकार से हस्तक्षेप की मांग की।
ऋषिकेश सांसद महेंद्र भट्ट ने सदन में बताया कि बापूग्राम और मीरा नगर पिछले सात दशकों से बसे घनी आबादी वाले क्षेत्र हैं। वर्ष 1950 से यहां निरंतर आबादी रह रही है और 1980 तक इन क्षेत्रों की जनसंख्या लगभग 50 हजार तक पहुंच चुकी थी। वर्तमान में यहां हजारों परिवार निवास कर रहे हैं, जो नगर निगम क्षेत्र में होने के बावजूद नियमित रूप से करोड़ों रुपये का टैक्स अदा कर रहे हैं, लेकिन आज तक इन्हें राजस्व ग्राम का वैधानिक दर्जा नहीं मिल पाया है।
कागजों में अटकी पहचान, जमीनी हकीकत से बेखबर सिस्टम
राजस्व ग्राम घोषित न होने के कारण बापूग्राम और मीरा नगर के निवासियों को भूमि स्वामित्व से जुड़े दस्तावेज उपलब्ध नहीं हो पा रहे हैं। इसके चलते प्रधानमंत्री आवास योजना, किसान सम्मान निधि, वृद्धावस्था पेंशन सहित केंद्र और राज्य सरकार की कई कल्याणकारी योजनाओं का लाभ हजारों परिवारों तक नहीं पहुंच पा रहा है। सांसद ने कहा कि यह केवल तकनीकी नहीं, बल्कि प्रशासनिक लापरवाही का परिणाम है, जिसने पूरे क्षेत्र के विकास को बाधित कर दिया है।
संसद में उठा सवाल, केंद्र से समन्वय की मांग
शून्यकाल के दौरान सांसद भट्ट ने केंद्र सरकार से मांग की कि वह उत्तराखंड सरकार के साथ समन्वय कर बापूग्राम और मीरा नगर को शीघ्र राजस्व ग्राम घोषित करने के लिए आवश्यक दिशा-निर्देश जारी करे, ताकि स्थानीय नागरिकों को उनके संवैधानिक अधिकार मिल सकें और वर्षों से चला आ रहा असमंजस समाप्त हो।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद सड़कों पर उतरे लोग
यह मामला अब केवल सदन तक सीमित नहीं रहा। सुप्रीम कोर्ट के आदेश से उत्पन्न हालात के स्थायी समाधान की मांग को लेकर ऋषिकेश में हजारों लोग सड़कों पर उतर आए। बापूग्राम संघर्ष समिति के आह्वान पर आईडीपीएल मैदान से तहसील ऋषिकेश तक विशाल महारैली निकाली गई, जिसमें बापूनगर, मीरा नगर, 20 बीघा, शिवाजी नगर, गीता नगर, मालवीय नगर, अमितग्राम और मंसा देवी सहित आसपास के कई इलाकों के लोग शामिल हुए।
8 किलोमीटर का पैदल मार्च, सरकार के खिलाफ तीखी नारेबाजी
नगर निगम क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले इन इलाकों के निवासियों ने वन भूमि प्रकरण को लेकर करीब आठ किलोमीटर का पैदल मार्च किया। ‘ऋषिकेश बचाओ’ महारैली में भाजपा, कांग्रेस, हिन्दू शक्ति संगठन और बापूग्राम बचाव संघर्ष समिति समेत विभिन्न राजनीतिक और सामाजिक संगठनों की भागीदारी रही। प्रदर्शन के दौरान सरकार के खिलाफ जमकर नारेबाजी भी हुई।
डी-फॉरेस्टेशन और बुनियादी सुविधाओं की मांग
महारैली के बाद प्रदर्शनकारियों ने उपजिलाधिकारी को ज्ञापन सौंपा। ज्ञापन में वन भूमि को डी-फॉरेस्ट (वन मुक्त) करने, क्षेत्र को वैधानिक दर्जा देने के साथ ही सड़क, पेयजल, बिजली, सीवर और स्वच्छता जैसी मूलभूत सुविधाएं सुनिश्चित करने की मांग प्रमुख रूप से उठाई गई।
चार सप्ताह से जारी धरना, कैबिनेट प्रस्ताव की मांग
बापूग्राम संघर्ष समिति के नेतृत्व में बापूग्राम में पिछले चार सप्ताह से सांकेतिक धरना लगातार जारी है। इसे विभिन्न राजनीतिक, सामाजिक और व्यापारिक संगठनों का समर्थन प्राप्त हो रहा है। संगठनों ने सरकार से मांग की है कि वन भूमि को डी-फॉरेस्ट करने का प्रस्ताव राज्य कैबिनेट में पारित कर केंद्र सरकार को भेजा जाए और सुप्रीम कोर्ट में मामले की प्रभावी पैरवी सुनिश्चित की जाए।
वन भूमि के दावे पर ऐतिहासिक सवाल
धरनास्थल पर मौजूद लोगों का कहना है कि जिन जमीनों को वन भूमि बताकर सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर की गई है, उनका इतिहास संदिग्ध है। उनका दावा है कि महात्मा गांधी की शिष्या मीरा बेन ने आजादी से पहले ही उनके पूर्वजों को इन जमीनों पर बसाया था, ऐसे में इन्हें वन भूमि घोषित करना ऐतिहासिक तथ्यों के खिलाफ है।
नतीजतन, बापूग्राम–मीरा नगर का यह विवाद अब केवल भूमि का नहीं, बल्कि हजारों परिवारों के अधिकार, अस्तित्व और भविष्य से जुड़ा बड़ा मुद्दा बन चुका है, जिस पर सरकार के ठोस और स्थायी फैसले का इंतजार है।

